Sunday, April 13, 2014

मुक्तक वृन्द - "सृजन वन" - श्रेयस्कर : सरासर खोखले रिश्तों के बूते घर नहीं होते

मुक्तक वृन्द - "सृजन वन" - श्रेयस्कर : सरासर खोखले रिश्तों के बूते घर नहीं होते

सरासर खोखले रिश्तों के बूते घर नहीं होते

"जहाँ पर प्यार कम हो वो हसीँ मंज़र नहीं होते,
सरासर खोखले रिश्तों के बूते घर नहीं होते।
मुरलिया थामकर सदियों से जो बैठे हैं मंदिर में,
दिल की आँखों से देखो वो महज़ पत्थर नहीं होते। "

Monday, March 31, 2014

कि मुझको हर नज़र लगने से पहले प्यार करती है

"ना कोई रात है ऐसी कि जो तन्हा गुजरती है,
उन्ही के साथ से ये ज़िन्दगी हर पल सँवरती है।
मेरे माँ बाप की हर एक दुआ, जादू है कुछ ऐसा,
कि मुझको हर नज़र लगने से पहले प्यार करती है। "